ব্যবহারকারী আলাপ:Rajput balaram Singha
আলোচনা যোগ করুনदुर्जन निग्रह प्रयोग
🌞 महेश्वर शिव कहते हैं- हे मुनि ! संतों को अपनी रक्षा के निमित्त, अब मैं दुष्ट निग्रह हेतु एक अचूक प्रयोग का वर्णन करता हूँ, आप इसे धारण करो।
🖕 इस विद्या का समुचित कारण में ही प्रयोग करना चाहिए, अन्याय पूर्वक प्रयोग होने पर यह विद्या प्रयोगकर्ता के लिए ही अनिष्टकारी हो जाती है। अतः यह विद्या केवल साधकों के हितार्थ ही उपयोगी है। 🌹 अच्छे लोगों को सदा अपनी रक्षा करनी चाहिए। कभी भी मारण का निराधार प्रयोग नही करना चाहिए। मूर्खों द्वारा किया गया यह तंत्र स्वयं उन्ही के लिए घातक रहता है।
🌹" ॐ अं कं चं टं तं पं हं लं ह्रीं हुं सः हुं फट् स्वाहा। "💥
🌞 विनियोगः :- ॐ अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि: अष्टिश्छन्दः महापर्वतमहाब्धि महाग्नि महवायमहाधरा महाकाशानि षट् देवताः हुं बीजं ह्रीं शक्तिः ममाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
🌞 ऋष्यादि न्यास :- ॐ ब्रह्म ऋषये नमः ....शिरसि। अष्टिच्छन्दसे नमः... मुखे।
महापर्वतमहाब्धिमहाग्निमहावायमहाधरामहाकाश षट् देवताभ्यो नमः... हृदि। हुं बीजाय नमः.. गुह्ये। ह्रीं शक्तयै नमः.. पादयौ: । विनियोगाय नमः.. सर्वांगे ।
🌞 करन्यास :-
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
षडङ्गन्यास :- ॐ ह्रां हृदयाय नमः ।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ ह्रूं शिखायै वषट् ।
ॐ ह्रैं कवचाय हूँ ।
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ह्रः अस्त्राय फट् ।
🌸 ध्यान --
नाना रत्नार्चिराक्रान्तं वृक्षाम्भ: स्रवणैर्युतम् । ब्याघ्रादिपशुभिर्व्याप्तं सानु युक्तं गिरिं स्मरेत्।। 🌷🌸🌺
❤️ अनेक रत्नों के समूह, वृक्ष झरनों एवं सिंह आदि पशुओं से व्याप्त तथा चोटियों से युक्त पर्वतराज का स्मरण करना चाहिए।
मत्स्यकूर्मादिबीजाढ्यं नवरत्नसमंवितम् । घनच्छायं सकल्लोलमकूपारं विचिन्तयेत्।। मछली, कछुवा आदि से व्याप्त, नवरत्नवाले, मेघसम नील वर्णवाले तथा कल्लोलित महासमुद्र का ध्यान करना चाहिए।
ज्वालावती समाक्रान्त जगत्त्रितयमद्भुतम् । पीतवर्णं महावह्निं संस्मरेच्छत्रु शान्तये ।।
🌺 तीनों लोकों को ज्वालाओं से आक्रान्त करने वाले, अद्भुत एवं पीत वर्ण महाग्नि का शत्रु की शान्ति के लिए ध्यान करना चाहिये । 🌷 धरासमुत्थरेण्वौघमलिनं रुद्धभूदिवम् । पवनं संस्मरेद्विश्वजीवनं प्राणरूपतः ।।
🌷 पृथ्वी से उड़ायी गयी रेणु राशि से द्युलोक एवं भूलोक को मलिन एवं रुद्ध करने वाले तथा प्राण रूप से विश्व को जीवित रखने वाले पवन का स्मरण करना चाहिए।
🌹नदीपर्वतवृक्षादिफलिताग्रामसंकुला । आधारभूता जगतो ध्येया पृथ्वीह मंत्रिणा।।
🌺 नदी, पर्वत, वृक्ष आदि फलने-फूलने वाले ग्रामों से संकुलित तथा जगत की आधारभूता पृथ्वी का साधक को ध्यान करना चाहिए।
🌺 सूर्यादिग्रहनक्षत्रकालचक्रसमन्वितम् । निर्मलं गगनं ध्यायेत्प्राणिनामाश्रयप्रदम्।।
🌸 सूर्य आदि ग्रह, नक्षत्र एवं कालचक्र से समन्वित तथा प्राणियों को आश्रय देने वाले निर्मल आकाश का ध्यान करना चाहिए। इसके बाद पीठादि पर रचित सर्वतोभद्र मण्डल में मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठ देवताओं की स्थापना करके ... 🌷'ॐ मं मण्डूकादि परतत्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः।'
-- इस मन्त्र से पूजन करके नव पीठ शक्तियों की पूजा करें ।
🌞 पूर्वादि दिशाओं में -- ॐ जयायै नमः।
ॐ विजयायै नमः। ॐ अजितायै नमः।
ॐ अपराजितायै नमः। ॐ नित्यायै नमः। ॐ विलासिन्यै नमः। ॐ दोग्घ्र्यै नमः। ॐ अघोरायै नमः। ..
🌞 मध्य कर्णिका में .. ॐ मंगलायै नमः। पश्चात स्वर्णादि से निर्मित यंत्र या मूर्ति की विधिवत प्राणप्रतिष्ठा करें।
🌷ॐ ह्रीं आधारशक्ति कमलासनाय नमः । ॐ ह्रीं सर्वशक्तिपद्मासनाय नमः।
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🌞 इस मन्त्र से पुष्पाद्यासन देकर पीठ के मध्य स्थापित करके प्राणप्रतिष्ठा करें। मूल मन्त्र से पूजन करने के बाद आवरण पूजन संपन्न करें।
पुष्पांजलि ले कर --
संविन्मय परो देव परामृतरसप्रिय। अनुज्ञाम् देहि में देव परिवारार्चनाय ते।।
🌸 षट्कोण केशरों में आग्नेयादि चारों दिशाओं में और मध्य दिशा में : 🌷ॐ ह्रां हृदयाय नमः .. हृदयशक्तिश्रीपादुका पूजयामितर्पयामि नमः। 🌷ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा.. शिरःशक्तिश्रीपादुका पूजयामितर्पयामि नमः। 🌷ॐ ह्रूं शिखायै वषट्... शिखाशक्तिश्रीपादुकापूजयामितर्पयामि नमः। 🌷ॐ ह्रैं कवचाय हूँ .... कवचशक्ति श्रीपादुकापूजयामितर्पयामि नमः। 🌷 ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्...नेत्रत्रयशक्तिश्रीपादुकापूजयामितर्पयामि नमः। 🌷ॐ ह्रः अस्त्राय फट् ... अस्त्रशक्तिश्रीपादुकापुजयामितर्पयामि नमः।
🌸 पुष्पांजलि ले कर मुलमंत्रों का उच्चारण करके
अभीष्टसिद्धिं मे देहिशरणागत वत्सल।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ।
-- कहते हुए पुष्पांजलि देकर विशेषार्घ से जलविंदु डाल कर पूजितास्तर्पिता: सन्तु। यह कहें।
इति प्रथमावरण।
💥 इसके बाद भूपुर में पूर्वादि क्रम से इन्द्रादि दशदिक्पालों और वज्रादि आयुधों की पूजा कर के पुष्पांजलि दें। पश्चात धूपादि से ले कर नमस्कार पर्यन्त पूजन करके जप करें।
🌸 इस प्रकार उक्त छह देवताओं का ध्यान करते हुए मन्त्र का १६००० जप करना चाहिए । 🌺 तदुपरान्त षड् द्रव्यों ( धान, चावल, घी, सरसो, जौ, तिल ) से प्रत्येक द्वारा यथाभाग (२६७ आहुति ) आहुति देना चाहिए। 🌸 तत्तद्दशांश तर्पण, मार्जनादि संपन्न करना चाहिए। इस प्रकार अनुष्ठान पूर्ण करने पर मन्त्र प्रयोग की योग्यता आती है। शत्रु के उपद्रवों से त्रस्त व्यक्ति को उस शत्रु के नाश के लिए इस सिद्ध मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए ।
💥 अब प्रयोग को बताते हैं -- आरम्भ में प्राणायाम के साथ वर्णों का इस प्रकार ध्यान करें । 🌷अ.कारं पर्वताकारं धावन्तं शत्रुसन्मुखम्। पतनोन्मुखमत्युग्रं प्राच्यां दिशि विचिन्तयेत्।।
👉 पर्वत के समान आकार वाले, शत्रु की ओर धावमान और उसके ऊपर पतनोन्मुख एवं अतिउग्र 'अ.कार' का पूर्व दिशा में ध्यान करना चाहिए। 🌷क.कारं क्षुब्धकल्लोलं प्लाविताखिल भूतलम्। समुद्ररुपिणं भीमं प्रतीच्यां दिशि संस्मरेत्।।
👉 समुद्र जैसे रूप वाले, क्षुव्ध तरंगों से समस्त भूतल को आप्लावित करने वाले 'क.कार' का पश्चिम दिशा में ध्यान करना चाहिए।
🌷 वर्णम् तदग्रिमं ज्वालासंघव्याप्त नभस्थलम् । याम्ये रब्धजगद्दाहं स्मरेत् प्रलयपावकम्।।
👉 ज्वालाओं से सम्पूर्ण आकाशमण्डल एवं धरती को व्याप्त करने वाले, समस्त जगत को भस्म करने वाले तथा प्रलयाग्नि के समान च.कार का ध्यान दक्षिण दिशा में करना चाहिए।
🌷 तृतीयवर्गप्रथमं प्रकम्पितजगत्त्रयम् । युगान्तपवनाकारमुत्तरस्यां दिशि स्मरेत् ।।
👉 प्रलयंकारी तूफानों से तीनों लोकों को प्रकम्पित करने वाले तृतीय वर्ग के प्रथम अक्षर 'ट.कार' का उत्तर दिशा में ध्यान करें।
🌷तुरीयपञ्चमाद्यर्णौ पृथ्वी गगनरूपिणौ । शत्रुवर्ग वाधमानौ चिन्तयेन्नियतात्मवान् ।।
👉 शत्रुवर्ग को बांधने वाले, पृथिवी एवं आकाशरूपी चतुर्थ और पंचमवर्ग के प्रथम अक्षरों 'त..कार' एवं 'प..कार' का नियतात्मा साधक ध्यान करें। 🌷 तदग्रिमं वर्णयुगं शत्रोर्निःश्वासपद्धतिम्। निरुन्धानं स्मरेन्मंत्री विदधद्रि पुमाकुलम् ।।
👉 शत्रु की श्वास प्रणाली को रोकने वाले तथा शत्रुओं को व्याकुल करनेवाले अग्रिम दोनों वर्णों 'ह' और 'ल' का ध्यान करें।
🌷 मायादिवर्णात्रितयं शत्रोर्नेत्रश्रुती मुखम्। प्रत्येकं तु निरुन्धानं चिन्तयेत्साधकोत्तम: ॥
👉फिर श्रेष्ठ साधक शत्रु के नेत्र, मुख एवं कान को अवरुद्ध करने वाले मायादि तीनों वर्णों ' ह्रीं हूँ सः ' का ध्यान करें। इसके बाद हूँ से संक्षोभित तथा फट् से शत्रु को उठाकर अग्नि में उसके शरीर को भस्म करते हुए 'हूँ फट् ' का चिंतन करे।
🌞 इसप्रकार मन्त्र के सभी वर्णों का ध्यान करते हुए मांत्रिक १००० जप करे। परिणाम स्वरुप शत्रु का नाश सुनिश्चित हो जाता है।
🌞 इसप्रकार का प्रयोग करने वाले साधक को प्राणायाम एवं जप आदि से आत्मशुद्धि करके अपनी रक्षा के लिए परमतत्त्व की भक्ति करनी चाहिए ।
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